दुकान बंद करके आई तो लैंप जलाकर बैठ गई।
मेज़ पर पड़ी पुरानी किताब बहुत दिन बाद उठाई। खाता फिर से लिखना शुरू किया है तो सोचा जरा पढ़कर तरीका ठीक से समझ लूं।
लैंप की हल्की रोशनी में पन्ने पलटते हुए वक़्त का पता ही नहीं चला। दिनभर बैठे रहने से कमर अकड़ी हुई थी, किताब खोलते ही वो भी भूल गई।

रात का यही थोड़ा-सा समय अपने लिए लगता है।
