सुबह वक्त से पहले आँख खुल गई थी।
शादी वाला सीजन आ गया है, दिमाग में लिस्ट घूमती रहती है इन दिनों।
चाय बनाने रसोई तक गई तो छत का दरवाज़ा वैसे ही खुला रह गया था कल रात से।
बाहर झाँककर देखा तो बादल हल्के गुलाबी हो रहे थे धीरे धीरे।
हाथ में कप लिए वहीं खड़ी रह गई कुछ देर।
रिटायर हुए वक्त हो गया फिर भी सुबह जल्दी उठने की आदत नहीं छूटी अब तक।
पहले नौकरी की मजबूरी थी, अब शायद बेचैनी की वजह से आँख खुल जाती है।

आजकल घर में ब्रेड बनाने का शौक चढ़ा हुआ है, आज गूंथा नहीं बस छत पर खड़ी रह गई।
काम की कोई जल्दी नहीं अब, फिर भी मन कहीं और भागता रहता है इन दिनों।
थोड़ी देर के लिए सब रुका हुआ सा लगा, बस इतना ही कहना था।
