आज काम इतना था कि रोटी 9 बजे तक नहीं बनी।
बैठे तो साथ में नान भी आ गया, मेज़ पर एक साथ इतना कुछ लगा देख के थाली भरी-पूरी लग रही थी।
हाथ में पहले जैसा ज़ोर नहीं रहा तो आटा गूंधना भी अब मेहनत का काम लगता है,

फिर भी सब कुछ टेबल पर सजा देख के मन थोड़ा हल्का हो गया।
काम कम हो तभी ऐसे इत्मीनान से बैठ पाते हैं, वरना दिन यूं ही निकल जाता है।
