माँ की उँगलियाँ आज भी उतनी ही तेज़ चलती हैं। ऊन का गोला और सलाइयाँ हाथ में लिए बैठी थीं, स्वेटर बुन रही थीं, मैं बगल में बैठा बस देखता रह गया।
एक-एक फंदा कितनी सफ़ाई से डालती हैं! गलती हो जाए तो बिना घबराए उधेड़ के फिर से शुरू कर देती हैं। मुझसे तो एक लाइन भी सीधी नहीं बुनी जाती जी।
मैंने पूछा, इतनी देर बैठे-बैठे कमर नहीं दुखती?
तो बोलीं, “आदत है, तुम पहले अपनी कमर देखो।”
बात एकदम सही थी। दुकान पर पूरा दिन काउंटर के पीछे बैठे रहने से पीठ और कंधे बुरी तरह अकड़ गए हैं, अब सीधा बैठना भी याद रखकर करना पड़ता है। घर आकर आटा गूँधते वक्त भी वही अकड़न लौट आती है।

फिर भी माँ को देखकर लगा, हाथ का काम हो या रोज़ का बैठना, सीधी पीठ और धीरज दोनों एक साथ ही चलते हैं। सलाइयों की हल्की सी आवाज़ के बीच शाम कब निकल गई, पता ही नहीं चला।
स्वेटर अभी आधा ही बना है, बाकी अगले हफ़्ते।
