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जीवन का समय आज की एक तस्वीर

[बनाया] माँ की बुनाई

माँ की उँगलियाँ आज भी उतनी ही तेज़ चलती हैं। ऊन का गोला और सलाइयाँ हाथ में लिए बैठी थीं, स्वेटर बुन रही थीं, मैं बगल में बैठा बस देखता रह गया।

एक-एक फंदा कितनी सफ़ाई से डालती हैं! गलती हो जाए तो बिना घबराए उधेड़ के फिर से शुरू कर देती हैं। मुझसे तो एक लाइन भी सीधी नहीं बुनी जाती जी।

मैंने पूछा, इतनी देर बैठे-बैठे कमर नहीं दुखती?
तो बोलीं, “आदत है, तुम पहले अपनी कमर देखो।”

बात एकदम सही थी। दुकान पर पूरा दिन काउंटर के पीछे बैठे रहने से पीठ और कंधे बुरी तरह अकड़ गए हैं, अब सीधा बैठना भी याद रखकर करना पड़ता है। घर आकर आटा गूँधते वक्त भी वही अकड़न लौट आती है।

Wool knitting in progress to make a sweater. My mom does this so well!

फिर भी माँ को देखकर लगा, हाथ का काम हो या रोज़ का बैठना, सीधी पीठ और धीरज दोनों एक साथ ही चलते हैं। सलाइयों की हल्की सी आवाज़ के बीच शाम कब निकल गई, पता ही नहीं चला।

स्वेटर अभी आधा ही बना है, बाकी अगले हफ़्ते।

टिप्पणियाँ 3

  • मुस्कान09.16

    मुझसे भी सीधा नहीं बैठा जाता, 10 मिनट में कमर अकड़ जाती है, धीरज वाली बात एकदम सही लगी

  • खुशबू09.16

    शेयर करने के लिए शुक्रिया… दिल छू गया

  • खुशबू09.17

    आटा गूंधते वक्त अकड़न वाली बात एकदम सही है, मुझे भी रसोई में खड़े रहने से कमर दुखने लगती है

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