सुबह गली के मोड़ वाली दुकान के पास से गुज़री।
वहाँ पुरानी वर्कबेंच रखी थी, drill और vice के साथ, ईंट की दीवार से सटी हुई।
रुक कर थोड़ी देर देखती रही।

हाथ-पैर में ताकत नहीं बची अभी, ऐसी चीज़ें देखकर सोचती हूँ शुरुआत कहाँ से करूँ।
2 महीने से यही सोच रही हूँ, अब तक कुछ शुरू नहीं किया।
काम का भी यही हाल है, कभी दिन भर कुछ नहीं, कभी बिलकुल फुरसत नहीं मिलती।
आज बस इतना लगा, इस मेज़ जैसी कोई ठोस शुरुआत चाहिए।
