आज दुकान 8 बजे बंद करके घर लौटी।
पूरे दिन बैठे-बैठे कमर अकड़ गई थी, सीधा होने में भी वक्त लगा।
फिर भी उठकर आटा गूंधने बैठ गई, रोटी-नान बनाकर थाली सजा दी।
पिछले महीने से घर का हिसाब-किताब फिर लिखना शुरू किया है, तो अब बाहर का खाना लगभग बंद है, ज़्यादातर घर पर ही बनता है।
अकेले पकाना कभी-कभी थकाता है, पर जेब पर हल्का ज़रूर पड़ता है।
वैसे रोज़ ब्रेड बनाने की आदत है, आज मन बदलकर रोटी-नान की तरफ मुड़ गया।
थाली देख के बस यही लगा, इतना भी काफ़ी है…

