दुकान बंद करके निकले थे, बस 2 दिन के लिए। पोखरा में रुके कमरे की बालकनी से ये व्यू दिखा, फेवा झील, पूरी वैली, और पीछे पहाड़ों की लाइन एक साथ। बालकनी पर लाल झंडा हल्का हिल रहा था हवा में।

रास्ते में बैठे-बैठे पीठ अकड़ गई थी, यहाँ खड़े होकर थोड़ा तन कर देखा तो सब ठीक लगने लगा। दुकान में रोज़ यही होता है, सुबह से शाम तक एक ही कुर्सी पर, शरीर उसी शेप में जम जाता है।
ऐसा खुला नज़ारा बहुत दिन बाद देखा। घर जाकर फिर वही हिसाब-किताब की कॉपी खोलूँगा, पर अभी ये 2 मिनट बस यहीं रुक कर देखता रहा।
