दुकान बंद करके निकली तो सड़क के मोड़ पर घड़ी वाला टावर दिख गया।
बत्ती जल चुकी थी, पीछे बादल ऐसे जमे थे कि टावर की परत काली छाया जैसी लग रही थी।
रुक गई थोड़ी देर, बस देखती रही। रोज़ इस रास्ते से जाती हूँ पर ऊपर देखने का ख़याल कभी नहीं आता, आज अचानक नज़र चली गई।

हिसाब-किताब फिर से लिख रही हूँ इन दिनों, शाम को बैठकर पुरानी कॉपी में भरती हूँ। झुककर बैठने से कमर और गर्दन अभी भी भारी रहती है, पर पहले जैसा तेज़ दर्द नहीं, धीरे-धीरे ठीक होता जा रहा है ऐसा लगता है।
घर पहुँचकर आटा गूंधना है, सुबह से भिगो रखा था। टावर की घड़ी की सुई देखकर लगा टाइम कितनी जल्दी निकल जाता है, दुकान में बैठे-बैठे पता ही नहीं चलता।
थोड़ी देर उस रोशनी और छाया को देखकर अच्छा लगा, बस इतना ही। हाहा, वैसे मैं आसमान-वासमान देखने वाली इंसान नहीं हूँ, पर आज रुक गई।
