आज सुबह रोटी के लिए आटा लेने निकली थी।
रास्ते में कुछ सूखे पत्ते और छोटे पाइनकोन पड़े मिले, उठा लाई।
घर आकर धागे से बाँध दिया, साथ में एक छोटी चिट्ठी भी रख दी।
पड़ोस वाली दीदी को रोटी के डिब्बे के साथ भेजने का सोचा है।
हाथ में ताकत कम है तो धागा बाँधने में भी वक़्त लगा, कोई 10 मिनट।
हाथ अब भी थोड़ा जकड़ा हुआ है, पर चिट्ठी पर लिखते वक़्त ध्यान नहीं गया।

पैसे खर्च किए बिना भी कुछ बना देने जैसा लगा।
