दुकान का हिसाब लिखते-लिखते कब रात हो गई पता ही नहीं चला, लैपटॉप खोलकर बैठी तो बगल में रखी कॉफ़ी भी ठंडी होती रही।
कमर में अब भी हल्का भारीपन रहता है, तो दीवाली की सफ़ाई वाली बात के बाद यहीं किसी ने जो तरीका बताया था, वही ब्राउज़र में ढूंढती रही।

घर में सब सो चुके थे, स्क्रीन की हल्की रोशनी में अकेले बैठना अलग ही सुकून देता है। कॉफ़ी आधी रह गई, पर मन कुछ हल्का हो गया।
