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मन का समय ›कृतज्ञता डायरी

बस एक शुक्रिया की बात

बड़ी बात होने की ज़रूरत नहीं। बस आज की एक बात काफी है। बस सही समय पर आ गई, किसी ने दरवाज़ा पकड़ रखा — इतना ही काफी है। ज़बरदस्ती ढूँढने की ज़रूरत नहीं। जिस दिन कुछ न मिले, उस दिन न लिखें।

बस कुछ दिन लिखकर देखिए, धीरे-धीरे उन दिनों में भी कुछ न कुछ दिखने लगेगा जब पहले कुछ नहीं दिखता था। किसी और की पोस्ट पर कमेंट करना ज़रूरी नहीं। बस पढ़कर चले जाना भी काफी है।

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