आज शाम से मन थोड़ा भारी है।
ऑफिस में एक मीटिंग के बीच अचानक हाथ में खुजली शुरू हो गई।
पहले ध्यान भी नहीं गया था कि अंदर से तनाव इतना बढ़ रहा है, पर शरीर पहले जता देता है।
यह अभी शुरुआत जैसा ही लग रहा है, ठीक से समझ नहीं आ रहा कि अंदर क्या चल रहा है।
घर आकर बच्चों को देखा तो थोड़ी राहत मिली, पर आवाज़ें अभी भी सिर में गूंज रही हैं।
दोनों साथ में शोर मचाते हैं तो अच्छा भी लगता है, और थकान भी दुगनी हो जाती है, दोनों एक साथ।
पिछले हफ्ते फिल्म कैमरे से गली की कुछ तस्वीरें खींची थीं, अभी तक रोल डेवलप के लिए नहीं भेज पाई हूं।
शायद इसी वजह से मन थोड़ा अटका हुआ सा लग रहा है, कुछ अधूरा सा।
रात को सोने का समय भी अब पहले से काफी पीछे खिसक गया है।
सब सो जाते हैं, तब भी फोन लिए बैठी रहती हूं, नींद का नाम ही नहीं आता।
मेरे साथ ही शायद ऐसा होता हो, सबके साथ नहीं।
बस आज का दिन ऐसा ही बीता, यही सबको बताना था।
