आज शाम से एक अजीब सी ख़ामोशी छाई है, जाने का नाम ही नहीं ले रही।
दफ़्तर से लौटते वक़्त शरीर भारी सा लग रहा था, जैसे दिन भर की थकान त्वचा तक उतर आई हो।
बच्चों को सुलाने के बाद जो थोड़ा वक़्त अपने लिए बचता है, आजकल उसी में नींद और दूर खिसकती जा रही है।
पहले जल्दी आँख लग जाती थी, अब देर तक करवटें ही बदलती रहती हूं।
मेरे मामले में शायद ऐसा है कि दिन भर जो अंदर दबा रहता है, वही रात होते-होते बाहर निकलने लगता है।
आज भी वही हुआ, हल्की सी खुजली और मन का बोझ दोनों साथ-साथ बढ़ते गए।
बालकनी में थोड़ी देर खड़ी रही, सामने वाली गली की बत्तियाँ एक-एक करके बुझ रही थीं, वैसा ही कुछ अंदर भी बुझता जा रहा था।
खिड़की के बाहर हवा भी रुकी हुई सी है, न पत्ता हिल रहा है न कुछ और।
बस यूं ही बैठी हूं, न सोने का मन है न जागने का।
रात सबके लिए भी शायद ऐसी ही खिंची हुई होगी।
