बारिश के इस मौसम में गर्दन और कोहनी की सलवट पर जो खुजली शुरू हुई है, वह किसी घने बादल जैसी लगती है, हटती नहीं, बस थोड़ी देर को छँट जाती है और फिर उसी जगह लौट आती है, हल्दी और नीम का लेप लगाया तो थोड़ा आराम मिला था, मगर वह आराम भी बस एक शाम भर का निकला, ब्लाउज़ की सिलाई जहाँ त्वचा को छूती है वहाँ रगड़ लगती रहती है और रात को नींद भी देर से आती है, मन में एक अजीब सी घुटन बैठी रहती है, मानो मौसम बाहर नहीं, अंदर ही बदल रहा हो।
अगले महीने भतीजे की शादी में हाथ खुले रहने वाले हैं, यही सोचकर मन थोड़ा उखड़ा हुआ रहता है, मतलब कोई पूछे तो क्या कहूँ, यह सवाल रात-रात भर साथ बैठा रहता है।
