रात को नींद नहीं आ रही है।
काम का दबाव जैसे सीधा चेहरे पर उतर आया है।
गाल के पास की त्वचा फिर से लाल हो गई है।

बच्चों को सुलाने के बाद घर में जब सन्नाटा होता है, तब मन बहुत भारी हो जाता है।
दिनभर की थकान मानो उसी वक्त इकट्ठा होकर आती है।
पुराने कैमरे से गली की तस्वीरें लेने का मन तो होता है, पर हाथ ही नहीं उठता है।
बस बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचती रहती हूँ कि यह सब कब हल्का होगा।
अभी शुरुआत ही है, इसलिए ज़्यादा उम्मीद भी नहीं रखी है।
बस आज की रात थोड़ी थकी हुई सी लग रही है।
सबका हाल भी शायद कुछ ऐसा ही होगा।
