सुबह हाथ धोते वक़्त फिर वही खिंचाव सा महसूस हुआ। पिछले कुछ दिनों से यही रोज़ की शुरुआत बन गई है।
ऑफिस में आज मीटिंग पर मीटिंग लगी रही। बीच-बीच में हथेलियाँ रगड़ती रही, बाद में देखा तो लाल हो चुकी थीं। डेस्क पर ही क्रीम रखनी शुरू की है, कम से कम याद तो आ जाता है।
आज का दिन कुछ यूं रहा –
– सुबह हल्की जलन हाथों में
– ऑफिस डेस्क पर क्रीम रखनी शुरू
– शाम को बेटी का सवाल
– रात को कॉटन के दस्ताने पहनकर सोना
घर आकर बच्चों का होमवर्क, खाना, फिर वही शाम की भागदौड़। बेटी अचानक बोली, “मम्मी हाथ पर ये क्या है?” जवाब में बस इतना कहा, “कुछ नहीं बेटा, ठीक हो जाएगा।”
रात को नया मॉइस्चराइज़र लगाकर कॉटन के दस्ताने पहन कर सोई। पहले से थोड़ा अच्छा लगा, देखते हैं कितने दिन टिकता है।
इस बार भी वीकेंड की पहाड़ी वाली प्लानिंग टालनी पड़ी। अगले महीने एक के बाद एक शादियाँ भी हैं, फुल स्लीव कुर्ते ही निकालने होंगे अलमारी से।
बस आज का दिन ऐसा ही था। कुछ अजीब सी थकान है बदन में, पर लिख कर थोड़ा हल्का लग रहा है!
