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मन का समय ›मन का मौसम

खिंची सी रात

आज शाम से त्वचा फिर तंग सी लग रही है।
हाथ के अंदर वाले हिस्से में खिंचाव बहुत बढ़ गया है।
सुबह बच्चों को स्कूल भेजते वक़्त हाथ धोते ही जलन शुरू हो गई थी।
ऑफ़िस में भी पूरा दिन आस्तीन नीचे किए रही, किसी को दिखाना नहीं चाहती थी।

इस हफ्ते एक के बाद एक शादियां भी सिर पर हैं।
साड़ी में हाथ खुले रहेंगे, यही सोचकर मन भारी हो रहा है।
पिछली शादी में किसी ने पूछ लिया था
“यह क्या हो गया हाथ में”
उस दिन से थोड़ा डर सा बैठ गया है।

पहाड़ पर जाने का मन तो बहुत था इस वीकेंड।
पसीना निकलते ही खुजली और तेज़ हो जाती है, इसलिए घर पर ही रुक गई।
बच्चे पूछते रहे कहां जाना है, कुछ बहाना बना दिया।

रात होते-होते हालत और बिगड़ जाती है।
नींद बीच में टूट जाती है, हाथ को दबाए रखने में ही निकल जाती है रात।
कल फिर वही दिन दोहराना है, बस यही सोच कर थकान महसूस हो रही है।

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