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मन का समय ›मन का मौसम

उखड़ा सा दिन

आज सुबह से हाथ में जान ही नहीं है,
रोटी गूंधते-गूंधते भी दो बार बैठना पड़ा।
पिछले 2 महीने से यही चल रहा है, कभी काम का ढेर लग जाता है तो कभी पूरे दिन कुछ नहीं,
और शरीर भी ठीक उसी वक्त साथ छोड़ देता है।
आज खाता लिखने बैठी तो आधे में ही छोड़ दिया,
मतलब बस मन ही नहीं लगा।
शाम 6 बजे तक बिस्तर पर ही पड़ी रही।
किसी और का भी दिन ऐसा जाता है क्या?

कमेंट 2

  • बारिश08.11

    रोटी गूंधना कितना थका देता है ये मुझे भी पता है जी, हाथ अचानक साथ छोड़ देते हैं ऐसे दिनों में

  • सुहानी08.12

    मुझे भी कभी कभी ऐसा होता है, खड़े रहने वाला काम है तो शाम तक पैर और हाथ दोनों जवाब दे देते हैं. खाता लिखने का मन ही नहीं करता उन दिनों, सोचती हूँ बाद में करूंगी पर छूट ही जाता है.

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