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मन का समय ›मन का मौसम

ठहरी हुई हवा

आज सुबह उठी तो लगा जैसे शरीर में हवा ही नहीं बची।
हाथ उठाने में भी ज़ोर लग रहा था, मतलब बस इतना।

रसोई में आटा गूंथते वक़्त हाथ कांप रहे थे, 3 मिनट में ही थक गई।
पहले तो 10 मिनट आराम से गूंथ लेती थी।

काम का महीना है, क्लाइंट के मेल पर मेल आ रहे हैं, फिर भी उठने का मन नहीं हुआ।
बिस्तर से 9 बजे तक नहीं निकली, ये मेरे लिए नई बात है।

खाता-बही फिर से लिखना शुरू किया था इस हफ़्ते, आज वो भी बंद पड़ी है।

समझ नहीं आता, ताकत कहां से लाऊं?
कहां से शुरू करूं, ये भी तय नहीं हो रहा।

बस आज का दिन ऐसा ही रहा, भारी और ठहरा हुआ।

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