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मन का समय ›मन का मौसम

बिखरी सी रात

आज रात नींद फिर टूट-टूट के आई।
घड़ी देखी तो 1 बज चुके थे।

बच्चों को सुलाने के बाद भी मन शांत नहीं हुआ, ऑफिस की एक बात दिमाग़ में अटकी रही।

पुराना कैमरा हाथ में लेकर बालकनी में थोड़ी देर खड़ी रही, कुछ खींचा नहीं, बस सामने वाली गली को देखती रही।

रोल में अभी भी 8 फ़्रेम बचे हैं, पर आज खींचने का मन नहीं हुआ।

खुजली आज कंधे के पास थोड़ी सी थी, बाकी ठीक रहा।

Walking Path

ये सब शुरू किए अभी 2 हफ़्ते ही हुए हैं, मेरे मामले में शायद रात का यही समय सबसे भारी होता है।

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