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मन का समय ›मन का मौसम

सुस्त सी रात

आज गर्दन के पास खिंचाव सा महसूस हुआ, ठीक उसी जगह जहाँ पहले भी होता रहा है।

दफ़्तर की मीटिंग के बीच में ही हाथ अपने आप वहाँ चला गया।

घर आकर बच्चों को सुलाया, फिर बैठी तो नींद कहीं दूर खिसकती चली गई। पिछले कुछ दिनों से ऐसा ही हो रहा है, बत्ती बंद करने का समय खुद-ब-खुद पीछे सरकता जा रहा है।

बीच में थोड़ी देर के लिए पुराना कैमरा उठाकर गली तक निकल गई थी। सड़क की बत्ती की रोशनी में कुछ खास नहीं दिखा, बस मन थोड़ा हल्का हुआ।

लौटकर फिर वही खिंचाव याद आया।

सबका भी कभी ऐसा कोई दिन गुज़रा हो शायद, बताइएगा।

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