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मन का समय ›मन का मौसम

रात खिसकी

शाम ढल रही है, पर कंधों का बोझ अब भी वैसा ही टिका है।

त्वचा भी उतनी ही खिंची हुई लग रही है जितना बाहर का आसमान भारी दिख रहा है।

घर में रौशनी जल चुकी है, फिर भी अंदर कहीं धुंध जैसी कोई परत बनी हुई है।

रात अपनी जगह से थोड़ी और आगे खिसक गई है, नींद अभी दूर कहीं खड़ी है।

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