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मन का समय ›मन का मौसम

बाहों में सुस्ती

बाहों में आजकल ज़ोर नहीं लगता। सुबह हाथ ऊपर उठाना भी भारी लगे तो समझ लो मौसम कैसा चल रहा है। रिज्यूमे भेजते-भेजते उंगलियाँ थक जाती हैं, बाकी शरीर वैसे भी हल्का कमज़ोर सा रहता है। स्केच बुक कोने में पड़ी है, कई दिन से पेंसिल हाथ में नहीं ली। किताब वाला इरादा अभी धूप जैसा है, है तो सही पर छूने पर गरमाहट नहीं मिलती। इंटरव्यू का ईमेल आया तो लगा जैसे अचानक हवा चल पड़ी, फिर वही ठहरा हुआ सन्नाटा लौट आया। त्वचा फिलहाल चुप सी है, कोई शोर नहीं मचा रही, यही राहत की बात है। कभी सोचती हूं ताकत कहां से लाऊं, फिर सोचना छोड़ देती हूं। दोस्त बोली थोड़ा टहल आया कर, सुनकर अजीब सा लगा, टहलना भी अभी दूर की बात लगती है। आज का मौसम बस इतना ही है, ना धूप ना बारिश, बीच में अटका हुआ कुछ~

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