आज सुबह 4 बजे आंख खुल गई.
कलाई पर हाथ अपने-आप (फिर से) चला गया था.
अरे, फिर वही निशान!
थोड़ी खुजा भी ली… रुक ही नहीं पाई.
बच्चों को स्कूल भेजा, फिर काम पर निकल गई.
दोपहर में हाथ पर हल्की जलन सी रही.
शाम को शादी के लिए पूरी बांह वाला कुर्ता ढूंढ रही थी.
पहाड़ों की ठंडी हवा याद आई, इस बार जाना टल गया.
बस आज कुछ ऐसा ही रहा.
लाल कलाई
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