हाथों में आज ज़रा भी जान नहीं है ।
सुबह से ब्रेड बनाने का सोचा था, आटा गूंथने के लिए हाथ उठा ही नहीं ।
फ्रीलांस का काम भी अजीब है, कभी इतना ढेर लग जाता है कि साँस लेने की फुर्सत नहीं, कभी पूरा दिन खाली, आज वाला दिन खाली वाला था फिर भी थकान गई नहीं ।
हिसाब-किताब की कॉपी फिर से खोली थी, थोड़ा लिखा, आज देखने का मन ही नहीं हुआ ।
स्थिति स्थिर है, यह पता है, फिर भी मतलब कहाँ से शुरू करूँ समझ नहीं आता, बस बैठी रह गई आज ।
बस यही हाल है साथियों ।
