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मन का समय ›मन का मौसम

बेजान हाथ

हाथों में आज ज़रा भी जान नहीं है ।

सुबह से ब्रेड बनाने का सोचा था, आटा गूंथने के लिए हाथ उठा ही नहीं ।

फ्रीलांस का काम भी अजीब है, कभी इतना ढेर लग जाता है कि साँस लेने की फुर्सत नहीं, कभी पूरा दिन खाली, आज वाला दिन खाली वाला था फिर भी थकान गई नहीं ।

हिसाब-किताब की कॉपी फिर से खोली थी, थोड़ा लिखा, आज देखने का मन ही नहीं हुआ ।

स्थिति स्थिर है, यह पता है, फिर भी मतलब कहाँ से शुरू करूँ समझ नहीं आता, बस बैठी रह गई आज ।

बस यही हाल है साथियों ।

टिप्पणियाँ 6

  • 버티는중09.15

    ऐसे दिन मुझे भी आते हैं

  • खुशबू09.15

    ये थकान कितने दिनों से लगातार बनी हुई है?

  • → खुशबूमुस्कानलेखक09.16

    कई दिनों से यही हाल है

  • → मुस्कानखुशबू09.16

    मुझे भी कई हफ़्तों से यही थकान लगी रहती है, ऐसे में (आराम) करना ही ठीक रहता है

  • मुस्कानलेखक09.16

    हाथों में ताकत ना हो तो आटा गूंथना सच में मुश्किल है, मैं भी ऐसे दिन कॉपी खोल कर बस बैठ जाती हूँ

  • गुनगुन09.19

    यह थकान मुझे भी पता है

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