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मन का समय ›मन का मौसम

छुपी आस्तीन

आज सुबह से गर्दन के पीछे वाली जगह फिर से खिंच रही थी।
कल शादी में पूरी बाजू का कुर्ता पहना था।
बच्चों को स्कूल भेजते भेजते ध्यान ही नहीं गया, कब हाथ खुजा डाला।
शाम को लोशन लगाने बैठी तो देखा कोहनी वाली जगह फिर लाल हो गई है।

बड़ी बेटी ने सुबह हाथ देख कर पूछा कि ये क्या हुआ है।
कोई जवाब नहीं दे पाई, बस मुस्कुरा दी।

मौसम भी अजीब है, कभी उमस तो कभी अचानक ठंडी हवा।
वीकेंड पर पहाड़ी ट्रेक पर जाने का सोचा था, अभी हिम्मत नहीं हो रही।
पिछली बार धूप में पसीना निकलते ही खुजली बहुत बढ़ गई थी।

शादियों का सीजन चल रहा है, हर हफ्ते कोई ना कोई कार्ड आ ही जाता है।
हर बार सोचती हूं [फुल स्लीव्स ही ठीक रहेगा], पर गर्मी में वो भी मुश्किल हो जाता है।
ऑफिस में भी बार बार आस्तीन नीचे खींचती रहती हूं।

रात को नींद भी ठीक से नहीं आई, बीच बीच में उठ के हाथ ही खुजाती रही।
सुबह उठी तो तकिए पर हल्के हल्के निशान थे।

बस यही सब चल रहा है आजकल।

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