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मन का समय ›मन का मौसम

भारी से कंधे

आज सुबह से शरीर में जैसे हवा ही नहीं बची थी।
हाथ उठाने में भी जोर लग रहा था, यही सोचती रही कि शुरुआत कहाँ से करूं।

पिछले कुछ दिनों से त्वचा भी ठीक नहीं लग रही, खुजली कम ज़्यादा होती रहती है, साथ ही शरीर की ताकत भी धीरे धीरे उतरती जा रही है, चलना तो दूर बैठे रहना भी भारी लगता है!

काम का भी वही हाल है, कभी इतना आ जाता कि सांस लेने की फुर्सत नहीं, कभी दिनों तक कुछ नहीं, उसी बीच शरीर संभालने का मन भी टूट जाता है।

घर पर रोटी की जगह ब्रेड बनाने बैठी, थोड़ी देर के लिए अच्छा लगा, पर आटा गूंधते हाथ में जो थोड़ी ताकत बची थी वो भी शाम होते होते गायब हो गई।

खर्चे का हिसाब भी फिर से लिखना शुरू किया है, पन्ने पर आंकड़े तो ठीक हो जाते हैं, शरीर का हिसाब कैसे बिठाऊं ये समझ नहीं आता।

मतलब आप सबको यूं ही बता रही हूं, मन हल्का करने के लिए।
हर तरफ से थोड़ा थोड़ा शुरू करने की कोशिश कर रही हूं, पर कहीं से पूरा नहीं हो पा रहा, सब आधा अधूरा सा लटका है।

थोड़ा लंबा लिख दिया, माफ़ी।

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