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मन का समय ›मन का मौसम

पहली ठंड

सुबह हवा में हल्की ठंडक थी। बरसात जा रही है, जाड़ा दस्तक दे रहा है। मौसम बदलते ही बाजू पर वही पुरानी झुनझुनी लौट आई। शादियों के कार्ड भी जमा होने लगे हैं, बाजू ढकने वाला कुछ ढूंढना है।

अभी से सोच में हूं।

पहाड़ पर जाने का मन तो बहुत है, पर इस बार जैकेट भी साथ लेनी पड़ेगी। हवा लगते ही खुजली (फिर से) बढ़ जाती है, ये मुझे पता है।

काम और बच्चों के बीच दिन जैसे-तैसे निकल गया।
शाम होते होते मन भी वैसा ही लगा, ना साफ ना बादल, बस अटका हुआ सा।

कमेंट 3

  • गुनगुन09.22

    मुझे भी यही होता है

  • चाँदनी रात09.22

    मौसम को जैसे पहले से पता होता है, हवा बदलते ही खुजली ठीक टाइम पर आ जाती है, ये हिसाब मुझे भी बड़ा पक्का लगा। शादी के कार्ड और खुजली एक साथ आना तो जैसे दोनों में साज़िश हो, बाजू ढकने का जुगाड़ हर साल नया ढूंढना पड़ता है। मैं भी आजकल बुनाई पर लगी हूं तो सोच रही हूं एक फुल स्लीव खुद ही बना डालूं, कम से कम इस बहाने कुछ काम का निकलेगा। पहाड़ पर जाइए जरूर, बस जैकेट को अपनी सबसे भरोसेमंद सहेली मान के

  • गुनगुन09.23

    अरे जी, जैकेट पैक करने से पहले ही बाजू ने जाड़े का ऐलान कर दिया, ये टाइमिंग कमाल है

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