सुबह हवा में हल्की ठंडक थी। बरसात जा रही है, जाड़ा दस्तक दे रहा है। मौसम बदलते ही बाजू पर वही पुरानी झुनझुनी लौट आई। शादियों के कार्ड भी जमा होने लगे हैं, बाजू ढकने वाला कुछ ढूंढना है।
अभी से सोच में हूं।
पहाड़ पर जाने का मन तो बहुत है, पर इस बार जैकेट भी साथ लेनी पड़ेगी। हवा लगते ही खुजली (फिर से) बढ़ जाती है, ये मुझे पता है।
काम और बच्चों के बीच दिन जैसे-तैसे निकल गया।
शाम होते होते मन भी वैसा ही लगा, ना साफ ना बादल, बस अटका हुआ सा।
