सुबह से हाथ ऐसे भारी हैं जैसे बाहर धुंध जमी हो। उंगलियों में ठंडक बैठी है, ताकत नाम की चीज़ नहीं बची। हल्का सा मग उठाना भी आज पहाड़ जैसा लगा। कलाई मोड़ने में भी जैसे जंग लगी हो। नौकरी वाला फॉर्म खुला पड़ा है, भरने का मन ही नहीं हुआ। स्केचबुक भी बंद पड़ी रही, पेंसिल तक नहीं छुई। किताब का वही पन्ना खुला है, आगे नहीं बढ़ पाया। चाय का कप बनाया तो सही, पर पीने का मन नहीं हुआ, ऐसे ही ठंडा हो गया। बस खिड़की के बाहर देखती रही, बादल भी जमे से लग रहे थे, हवा भी रुकी हुई सी थी। शरीर भी वैसा ही जमा हुआ सा है, हिलने का मन नहीं करता। मन के अंदर शांति है, बस हाथ-पैर साथ नहीं दे रहे। स्किन भी आज चुप सी है, ना खुजली ना राहत, बस एक ठहराव है।
जमी सी धुंध
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