आज पूरा दिन कुर्सी पर ही बीता।
लैपटॉप के सामने बैठे-बैठे शाम हो गई, उठी तो कमर सीधी नहीं हो रही थी।
3 दिन से यही चल रहा है।
कंधे भी अकड़ गए हैं, बीच में उठकर टहलना भूल ही जाती हूँ (फिर वही आदत)।
शाम को थोड़ी देर के लिए बाहर निकली।
पुराना फिल्म कैमरा साथ था, गली के मोड़ वाले पेड़ की एक फोटो खींची।
रोल में अब सिर्फ 4 फ्रेम बचे हैं।
घर आकर पैकिंग में लग गई।
शिफ्टिंग की तारीख पास आ रही है, तो जो सामान महीनों से छुआ नहीं, उसे निकाल रही हूँ।
आज 2 बॉक्स भरे – पुरानी किताबें और बेकार पड़े बर्तन।
मम्मी का फोन आया, बोलीं – “ठीक से पैक करना, वरना सब टूट जाएगा।”
बात मान ली।
रात तक कमर का दर्द थोड़ा हल्का हुआ।
आजकल तबीयत भी ठीक-ठाक ही चल रही है, बस यह बैठे रहने वाली आदत ठीक नहीं हो रही।
