सुबह घुटने में हल्की अकड़न थी। टहलने निकले तो हवा ठीक लगी, पर साँस जल्दी भारी हो गई, 12 मिनट में ही रुकना पड़ा! धूप चढ़ते-चढ़ते शरीर पर भी एक भारीपन उतर आया। दोपहर का मौसम सुस्त रहा, आंखों पर नींद का कोहरा भारी था। शाम होते-होते हवा साफ हुई, पर टांगें अब भी थोड़ी खिंची हुई थीं। किताब वाला कोना आज भी सूखा पड़ा रहा। रात का आसमान शांत था, बस मन में नौकरी वाली उधेड़बुन का धुंधलका छाया रहा। मोबाइल की स्क्रीन पर रात फिर देर तक अटकी रही।
अकड़ा घुटना
कमेंट 1
- चांदनी10.06
सुबह की अकड़न वाली बात से एकदम रिलेट हुआ, रात को फ़ोन में उलझना तो मेरे साथ भी रोज़ होता है…
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