रात में बच्चों को सुला देती हूं तब थोड़ी फुर्सत मिलती है।
और ठीक उसी वक्त खुजली शुरू हो जाती है।
दिन भर की भागदौड़ में शरीर को याद नहीं रहता, रात होते ही सब एक साथ निकल आता है।
ऑफिस में हाथ छुपाना मुश्किल हो गया है।
गर्दन और कलाई के निशान साफ दिखते हैं।
कोई पूछता नहीं, बस नज़र भर देख लेता है। वो नज़र (सबसे ज़्यादा) परेशान करती है।
ऊपर से शादियों का सीज़न चल रहा है।
पिछली शादी में साड़ी की जगह सलवार पहननी पड़ी, सिर्फ हाथ छुपाने के लिए।
अगली में क्या पहनूं, अभी से समझ नहीं आ रहा।
वीकेंड पर पहाड़ पर निकल जाती हूं तो थोड़ी सांस मिलती है।
पर सोमवार आते ही फिर वही चक्र शुरू हो जाता है।
इलाज अभी शुरू ही किया है, पता नहीं कब तक ऐसा चलेगा।
बस आज मन भारी था।
