इन दिनों बारिश शुरू होते ही गले के पीछे और कोहनी के मोड़ पर खुजली इतनी बढ़ गई है कि रात में नींद बीच में टूट जाती है, ब्लाउज़ का कपड़ा जहाँ-जहाँ छूता है वहाँ जलन सी होने लगती है, कभी-कभी तो खुजाते-खुजाते त्वचा लाल हो जाती है फिर भी हाथ रुकता नहीं। हल्दी और नीम का लेप बनाकर लगाया था, कुछ दिन तो सच में आराम लगा, मन में उम्मीद बंधने लगी थी कि शायद ठीक हो जाएगा, पर उसके बाद फिर वैसा ही हो गया, समझ नहीं आ रहा कि आखिर बार-बार यह क्यों लौट आता है।
बचपन में कुछ साल यही परेशानी हुई थी, फिर इतने लंबे समय तक कुछ नहीं हुआ कि मैं भूल ही गई थी कि ऐसा भी कुछ होता था, अब इस उम्र में 2 बारा शुरू हो जाना सच में हैरान कर देता है, कभी-कभी डर भी लगता है कि पता नहीं यह कब तक चलेगा। घर का सारा काम, नाती-पोतों की देखभाल, बर्तन-कपड़े का पानी, मसालों से हाथ का बार-बार वास्ता, इन सबसे बचना तो मुमकिन ही नहीं है, तो जो थोड़ा-बहुत आराम लेप से मिलता भी है वो भी टिकता नहीं।
ऊपर से अगले महीने भतीजे की शादी है, वहाँ हाथ खुले रहेंगे, कोई निशान देखकर पूछ बैठेगा तो मैं क्या जवाब दूंगी यह सोचकर ही अभी से मन भारी हो जाता है। कैसे बताऊं कि यह कोई नई बात नहीं, बचपन से जुड़ी पुरानी बात है, फिर भी सामने वाले को समझाना आसान नहीं लगता।
इन दिनों नौकरी बदलने की कोशिश भी चल रही है तो इंटरव्यू की तैयारी में देर रात तक जागना हो जाता है, घर का सामान भी ज्यादातर पुराना लिया-बेचा हुआ है तो उसमें भी दिमाग लगा रहता है, ऐसे में यह खुजली और नींद का टूटना मिलकर सब कुछ और थका देने वाला बना देता है।
किसी हल की उम्मीद में नहीं लिख रही, बस मन हल्का करना था, यहाँ सब लोग समझ जाएंगे शायद इसलिए लिख दिया।
