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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

अपने लिए वक्त ही नहीं बचता कभी

काम से लौटकर बच्चों को संभालना, फिर वीकेंड पर पहाड़ पर निकल जाना, ऐसा लगता है जैसे अपने लिए वक्त बचता ही नहीं। रात को जब सब सो जाते हैं तब हाथ और गर्दन की खुजली शुरू होती है। दिन भर ध्यान ही नहीं जाता, बस रात होते ही एहसास होता है कि (कितना खुजा रही थी) मैं।

अगले हफ्ते एक और शादी है, दोस्त की। तैयार होते वक्त सोचती रहती हूं कौन सी बाजू वाली ड्रेस पहनूं ताकि निशान ना दिखें। इस उम्र में भी ये सोचना अजीब लगता है…

घर में सब ठीक ही समझते हैं, ऑफिस में भी किसी को कुछ पता नहीं। बस मुझे पता है ये सब एक साथ संभालना कितना मुश्किल है। कोई सलाह नहीं चाहिए, बस कहीं लिखना था।

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