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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

बचपन में था, अब इस उम्र में फिर से

बचपन में कुछ साल यही तकलीफ हुई थी, फिर बरसों तक कुछ नहीं हुआ, तो अब इस उम्र में 2 बारा शुरू हो जाना समझ में नहीं आ रहा है। गर्दन पर और कोहनी के मोड़ पर दोनों जगह एक साथ, बरसात शुरू होते ही जैसे किसी ने फिर से याद दिला दिया हो। रात को सारा काम निपटाकर लेटती हूं तो गर्दन पर ब्लाउज़ का कपड़ा जरा सा भी छु जाए तो खुजली बहुत बहुत बढ़ जाती है, फिर नींद टूट जाती है। दिन भर हाथ पानी में, बर्तन-कपड़ों के साबुन में, मसालों में, नाती के लिए दूध-वूध बनाने में ही लगे रहते हैं तो कोहनी की जगह सूखी-सूखी सी रहती है और वहीं से शुरुआत होती है।

हल्दी और नीम का लेप लगाकर देखा था, दो-3 दिन तो लगा जैसे थोड़ा आराम है, फिर उसके बाद वही की वही हालत हो गई। मतलब समझ नहीं आता ठीक से असर हुआ नहीं या मौसम ही ऐसा है कि टिकने ही नहीं देता।

अगले महीने भतीजे की शादी है, ब्लाउज़ आधी बाजू का सिलवाया है, अब हाथ और गर्दन दोनों खुले रहेंगे। बीच शादी में कोई पूछ बैठे “ये हाथ पर क्या हुआ” तो पता नहीं क्या बोलूंगी, बचपन वाली बात तो अभी किसी को याद भी नहीं, सबको यही लगेगा कि अभी की कोई नई बात है।

ऊपर से नौकरी की तलाश भी चल रही है, रात में लैपटॉप खोलकर बैठ जाती हूं देर तक, सोने का समय पीछे ही खिसकता जा रहा है। घर का सामान भी सेकंड हैंड लेकर धीरे-धीरे जोड़ रहे हैं तो हर छोटी चीज़ में भी उलझन बनी रहती है। इन सबके बीच अपने लिए न ठीक से वक्त बचता है न ध्यान।

बस मन थोड़ा भारी सा हो गया है इन दिनों, दिन भर घर और बाहर के काम में लगे रहने के बाद भी लगता है कुछ अधूरा सा रह जाता है, और यह खुजली उसी में और जुड़ जाती है।

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