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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

फ्रीलांसिंग में रूटीन नहीं बन पाता

काम इन दिनों या तो बहुत ज्यादा रहता है या बिल्कुल नहीं, फ्रीलांसिंग में यही सबसे मुश्किल हिस्सा है।

खाली समय मिले तो सोचती हूं थोड़ी वॉक करूं, पर शरीर में ताकत बचती ही नहीं, बस लेटे रहने का मन करता है।

ब्रेड बनाना अब भी अच्छा लगता है, आटा गूंथते वक्त दिमाग थोड़ा शांत हो जाता है।

रूटीन कहां से शुरू करूं समझ नहीं आता, सोच-सोचकर ही थक जाती हूं।

View of a rainy cityscape through a window with water droplets.

बस मन हल्का करने को लिख दिया, ज्यादा लिख गई तो माफ़ करना।

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