इस बार बारिश शुरू होते ही गर्दन और कोहनी की सिलवटो में फिर से वही खुजली शुरू हो गई है, ब्लाउज़ का कपड़ा हल्का सा भी रगड़ खाए तो जलन जैसी होने लगती है! बचपन में कुछ साल यही तकलीफ हुई थी, फिर इतने लंबे समय तक कुछ नहीं हुआ कि भूल ही गई थी कि ऐसा कुछ था भी, तो अब इस उम्र में 2 बारा शुरू होना समझ नहीं आ रहा, थोड़ी घबराहट भी हो रही है।
घर का सारा काम, नाती-पोतों को संभालना, बर्तन-कपड़े, मसाले, सब कुछ हाथों से ही होता है, तो पानी और साबुन-सर्फ से बार-बार वास्ता पड़ता रहता है, बीच में मसाला हाथ में लग जाए तो जलन और तेज़ हो जाती है। रात को क्रीम लगाकर सोती हूँ, सुबह उठते ही फिर वही खुजाना शुरू हो जाता है।
हल्दी और नीम का लेप बना कर लगाया था, कुछ दिन थोड़ा आराम भी लगा, मन को तसल्ली हुई कि चलो अब ठीक हो रहा है, फिर अचानक से वैसा ही हो गया। मतलब समझ ही नहीं आ रहा कि गलती कहाँ हो रही है।
आज सुबह बहू ने देख कर पूछा भी, ‘माँजी, गर्दन इतनी क्यों खुजा रही हैं आप’ तो मैंने हँस कर बात टाल दी, अंदर से बहुत अजीब लगा।
अगले महीने भतीजे की शादी है, वहाँ हाथ और गर्दन खुले ही रहेंगे, कोई निशान देख कर पूछ बैठा तो क्या जवाब दूँगी, यही सोच कर मन भारी हो जाता है। मैचिंग वाला ब्लाउज़ भी सिलवा रखा है पर अब पहनने का मन ही नहीं हो रहा।

ऊपर से रात में देर तक जागना भी हो रहा है, नौकरी के लिए कुछ जगह देख रही हूँ इन दिनों, वो टेंशन अलग, सामान भी सेकंड हैंड से जोड़ रहे हैं तो उसका हिसाब-किताब भी सिर में घूमता रहता है, नींद वैसे ही देर से आती है।
समझ नहीं आ रहा यह सब ठीक होगा या नहीं, बस मन बहुत भारी हो रहा है इन दिनों, कुछ भी करने का मन नहीं करता!
