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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

आस्तीन वाला ब्लाउज़ पहन कर देखा

बरसात शुरू हुए काफी समय हो गया है, गर्दन और कोहनी के मोड़ पर जो खुजली शुरू हुई थी वो अभी तक वैसी की वैसी बनी हुई है, ब्लाउज़ का कपड़ा जहां-जहां छूता है वहीं सबसे ज़्यादा जलन होती है, रात को सोते समय हाथ खुद ब खुद वहीं चला जाता है और सुबह उठकर देखो तो हल्के-हल्के निशान बने मिलते हैं।

भतीजे की शादी सिर पर आ गई है और यही समझ नही आ रहा था कि जो ब्लाउज़ पहले से सिलवा रखे हैं उनमें से किसी की आस्तीन पूरी नही है, तो सोचा एक बार पूरी आस्तीन वाला ही पहन कर देख लूं, कम से कम निशान तो किसी को नहीं दिखेंगे। कल वही पहन कर पूरे दिन घर में रही ताकि पता चले कपड़ा चुभता तो नही, थोड़ी देर बाद हल्की सी जलन तो हुई पर उतनी नही जितनी सूती वाले में होती रही है, शायद कपड़ा थोड़ा मुलायम था इसलिए!

हल्दी और नीम का लेप भी इस बीच लगाया था, कुछ बार आराम भी लगा फिर जैसा था वैसा ही हो गया, अब समझ नहीं आता आराम लेप की वजह से मिला था या बस मन को तसल्ली मिल रही थी। घर का सारा काम तो हाथ से ही करना पड़ता है, बर्तन धोना, मसाला छौंकना, नाती को नहलाना, इसमें हाथ को आराम देने का कोई तरीका ही नहीं बनता। डॉक्टर के पास जाने का मन तो बनता है पर काम से फुर्सत ही नहीं मिल पा रही, नौकरी के लिए भी इधर-उधर बात चल रही है तो सारा ध्यान उसी टेंशन में लगा रहता है। घर का सामान भी अभी सेकंड हैंड ही जोड़ रहे हैं तो बचत का हिसाब अलग से सिर पर रहता है।

रात को नींद भी देर से आती है, सोचती रहती हूं कि शादी में कोई हाथ देखकर पूछेगा तो क्या बोलूंगी, फिर खुद को समझाती हूं कि इतना सोचने से कुछ ठीक नहीं होने वाला। आस्तीन वाला ब्लाउज़ पहनकर कम से कम इतनी तसल्ली ज़रूर है कि शादी वाले दिन हाथ ढके रहेंगे।

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