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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

मसालों-साबुन से हाथ, फिर वही जलन

पिछले करीब 3 हफ्ते से गर्दन और दोनों कोहनी की मोड़ पर खुजली इतनी बढ़ गई है कि रात को नींद ठीक से नहीं आती, आँख लगते-लगते फिर उठ जाती हूँ, और सुबह देखती हूँ तो वहां नाखूनों के निशान बने होते हैं। बचपन में यही परेशानी कुछ साल रही थी, फिर लंबे अरसे तक कुछ नहीं हुआ, तो सोचा था अब उम्र के इस पड़ाव में तो पीछा छूट गया होगा, पर बरसात शुरू होते ही वैसा ही सब लौट आया है, समझ में नहीं आता आखिर क्यों।

घर का सारा काम, नाती-पोतों को नहलाना-खिलाना, बर्तन-कपड़े, सब मैं ही करती हूँ, तो हाथों का पानी और साबुन-सर्फ से वास्ता तो लगा ही रहता है, ऊपर से रसोई में मसालों से भी हाथ जलने जैसा लगने लगा है। कुछ दिन हल्दी-नीम का लेप लगाया, दो-3 दिन थोड़ा आराम भी लगा, फिर वैसे का वैसा हो गया, समझ नही आता किस चीज़ से हो रहा है और किस से आराम मिल रहा है।

Raindrops on a car window blur the view of tall buildings and a parked white car outside. The scene

ब्लाउज़ का कपड़ा गर्दन और बांह पर रगड़ता है तो और तकलीफ बढ़ जाती है, इस मौसम में आस्तीन वाला पहनना भी मुश्किल हो गया है, पर बिना पहने भी चैन नहीं। अगले महीने भतीजे की शादी है, वहां हाथ तो खुले ही रहेंगे, कोई निशान देखकर पूछ लेगा तो क्या बताऊं, यही सोचकर मन भारी हो जाता है। रिश्तेदारों के सामने बार-बार सफाई देनी पड़े, यह ख्याल ही थकाने वाला है।

रात को देर तक जागना आजकल आदत सी हो गई है, नौकरी बदलने की टेंशन में कागज़-पत्तर देखते-देखते देर हो जाती है, फिर खुजली शुरू हो जाती है तो नींद और टूट जाती है। सुबह उठकर फिर वही रोज़ का काम, थकान उतरती ही नहीं। घर में जो सामान पुराना-नया मिलाकर जोड़ा है वह भी संभालना पड़ता है, और ऊपर से यह त्वचा वाली परेशानी, सब एक साथ बोझ जैसा लगने लगा है।

बस यही सब मन में घूमता रहता है, समझ ही नहीं आता कि इस उम्र में सब कुछ 2 बारा क्यों शुरू हो गया है।

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