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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

पोते को संभालते हाथ में फिर जलन

बरसात का मौसम आते ही गर्दन और कोहनी के मोड़ पर वही खुजली फिर से शुरू हो गई है, और इस बार तो जैसे रुकने का नाम ही नहीं ले रही। घर का सारा काम खुद ही करना पड़ता है, पानी-साबुन-मसाले से दिन भर वास्ता पड़ता रहता है, जैसे-

– सुबह बर्तन मांजना
– मसाला पीसना, हल्दी-मिर्च हाथ में लगना
– पोते को नहलाना-धुलाना, कपड़े बदलना
– शाम को कपड़े धोना

हाथ कभी सूखते ही नहीं, तो जलन कम होने का मौका ही नहीं मिलता। हल्दी और नीम का लेप लगाकर देखा था, कुछ दिन आराम भी लगा, फिर वैसे का वैसा हो गया, समझ नही आ रहा कि गलती कहां हो रही है।

बचपन में यही परेशानी हुई थी, फिर इतने सालों तक कुछ नहीं हुआ, अब इस उम्र में 2 बारा शुरू हुई तो पहले तो यकीन ही नहीं हुआ। मतलब जो चीज़ पीछे कहीं छूट गई थी लगा, वो अचानक लौट आई है, और घर में किसी को ठीक से बता भी नहीं पाती, बस चुपचाप लेप लगाती रहती हूं।

रात को नींद भी ठीक से नहीं आ रही, नौकरी के लिए तैयारी भी करनी है, resume वगैरह देखना है, पर आधा ध्यान खुजली में ही उलझा रहता है, तो सोने में और देर हो जाती है। ऊपर से अगले महीने भतीजे की शादी है, ब्लाउज़ की आस्तीन छोटी है, हाथ खुले ही रहेंगे, कोई पूछ बैठेगा तो क्या बोलूं समझ ही नहीं आता।

पुराना सामान जोड़-जोड़कर घर चलाया है, हर चीज़ में मेहनत लगी है, ये सब देखकर कभी-कभी बहुत बुरा लगता है कि इस उम्र में फिर से यही झेलना पड़ रहा है।

यहां किससे कहूं पता नहीं, इसलिए यहीं लिख दिया।

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