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मन का समय आँसुओं की कहानियाँ

पूरा दिन बैठे-बैठे कमर का बुरा हाल

A fluffy, light orange cat with bright blue eyes sits on a wooden floor. In the background, there ar

दुकान अकेले संभालती हूं, सुबह खोलने से लेकर शाम बंद करने तक ज़्यादातर वक़्त कुर्सी पर ही बैठे रहना पड़ता है। ग्राहक कम हों तो भी हिसाब-किताब का काम कुर्सी छोड़ने ही नहीं देता। पिछले कुछ समय से गर्दन और कमर का हाल बहुत बुरा हो गया है, झुक-झुक कर बैठने की आदत सी बन गई है और अब सीधे बैठना भी अजीब लगता है!

स्किन की तरफ़ से फ़िलहाल शांति है, ये मानती हूं। खुजली-वुजली वाला दौर अभी नहीं चल रहा, हाथ-पैर भी ठीकठाक दिख रहे हैं। पर जिस्म का बाकी हिस्सा जैसे साथ छोड़ता जा रहा है। कंधों में अकड़न, गर्दन में चुभन जैसा दर्द, कमर तो सीधे उठने में भी वक़्त लेती है। सुबह उठते ही लगता है जैसे रात भर सोई नहीं, हड्डियों में भारीपन बैठा रहता है।

आजकल दिन का हिसाब कुछ ऐसा बैठता है –
– सुबह गर्दन अकड़ी हुई
– दोपहर तक कमर में सुई जैसी चुभन
– शाम होते-होते कंधे पत्थर जैसे भारी
ये रोज़ का रूटीन बन गया है, अलग से गिनने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती अब, बस झेलती जाती हूं।

घर आकर भी आराम कहां मिलता है। रोटी-सब्ज़ी बनाना, फिर थोड़ी देर के लिए ब्रेड बनाने का मन बहुत करता था पहले, अब वो भी बोझ लगने लगा है। आटा गूंधते वक़्त हाथ ठीक चलते हैं पर पीठ सीधी नहीं रह पाती, बीच-बीच में रुक कर सीधा होना पड़ता है। पहले ये काम सुकून देता था, अब सिर्फ़ एक और काम जैसा लगता है जो निपटाना है, फिर भी छोड़ती नहीं क्योंकि हाथ से बनी चीज़ खाने का मन तो अब भी करता है।

रात को सोने से पहले हिसाब-किताब की डायरी फिर से लिखनी शुरू की है। सोचा था मन थोड़ा शांत रहेगा, पैसों का हिसाब सामने दिखेगा तो टेंशन कम होगी। पर बैठकर लिखने में भी वही कमर आड़े आ जाती है, कुछ लाइनें लिखकर उठना पड़ता है फिर 2 बारा बैठना पड़ता है। बेटी ने एक दिन देख कर कहा –
“मम्मी थोड़ा उठ के टहल लिया करो बीच-बीच में!”
सुनने में आसान लगता है, पर दुकान में ग्राहक के सामने से उठकर टहलना इतना आसान नहीं होता, और घर में भी डायरी बीच में छोड़ने का मन नहीं करता, वरना अगले दिन फिर हिसाब गड़बड़ हो जाता है।

कुछ दिनों से यही सोच रही हूं कि स्किन तो ठीक हो गई इस बार, पर बाकी शरीर उसकी जगह ले कर बैठ गया है। जैसे शरीर में तकलीफ़ का कोटा तय हो, एक जगह से हटती है तो दूसरी जगह आ बैठती है। उम्र का असर भी है शायद, बैठे रहने की आदत का भी, दोनों मिलकर हाल बुरा कर रहे हैं।

काम भी नहीं छोड़ सकती, दुकान अकेले चलानी है, कोई और संभालने वाला नहीं है। और रात को थक कर भी हिसाब लिखना बंद नहीं कर पा रही, आदत बन गई है अब, बीच में छोड़ने से मन और बेचैन रहता है। बस दिन ऐसे ही निकल रहे हैं, कमर सीधी करते-करते, कुर्सी और डायरी के बीच घूमते हुए।

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