आज दुकान बंद करते-करते हाथ अपने आप कमर पर चला गया, वहीं जहाँ हमेशा दर्द रहता है। सुबह से शाम तक अकेले काउंटर पर बैठे रहना पड़ता है, ग्राहक कम हों तो भी उठकर घूमने का मन नहीं होता, बस बैठे रहते हैं। कुछ महीनों से त्वचा ठीकठाक चल रही थी, लगा जैसे अब यह दौर पीछे छूट गया है, मगर आज दोपहर से हाथ की कोहनी के पास फिर वही जानी-पहचानी खुजली शुरू हो गई। पहले तो लगा पसीने की वजह से होगा, दुकान में पंखा भी ठीक से नहीं चलता, मगर शाम होते-होते जगह लाल हो गई और खुजली इतनी बढ़ गई कि काम के बीच में भी हाथ बार-बार वहीं जाता रहा।
घर आकर सोचा थोड़ा आराम कर लूँ, मगर उस दिन ब्रेड बनाने का भी दिन था। ओवन के पास खड़े रहना, आटा गूँधना, हाथ बार-बार पानी और आटे में डालना, इससे हाथों की हालत और खराब हो जाती है। पहले लगता था ब्रेड बनाना मन को शांत करने का तरीका है, अब लगता है यह भी शरीर के लिए और बोझ बन गया है। ओवन की गर्मी में पसीना आता है, वही पसीना त्वचा को और चिढ़ा देता है, फिर भी दुकान में मन नहीं लगता तो घर आकर यही करती हूँ।
रात को दुकान बंद करने के बाद हिसाब-किताब की डायरी फिर से निकाल ली है, काफी समय से बंद पड़ी थी, अब सोचा है फिर से नियम से लिखूँगी। मगर दिनभर बैठे रहने के बाद रात को भी टेबल पर बैठकर हिसाब जोड़ना, कमर और गर्दन के लिए और मुश्किल हो जाता है। कागज़ पर आँकड़े लिखते-लिखते हाथ की खुजली फिर याद आ जाती है, ध्यान भटक जाता है, फिर वही जगह खुजाने लगती हूँ जब तक निशान न पड़ जाए।
पति या बच्चे साथ में दुकान नहीं देखते, सब अकेले संभालना पड़ता है, तो उठकर टहलने या स्ट्रेच करने का समय भी नहीं निकलता। डॉक्टर कहते हैं ज़्यादा देर लगातार बैठे मत रहो, मगर दुकान में यह इतना आसान नहीं है। ग्राहक आ जाए तो उठना पड़ता है, नहीं तो बैठे-बैठे ही सब काम निपटाना पड़ता है।
इस उम्र में आकर लगता है शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता, थोड़ी देर बैठने से भी सब जकड़ जाता है, और त्वचा भी मन जैसे बिगड़ी है वहीं दिखा देती है। दुकान, ओवन, हिसाब-किताब, इन सबके बीच में शरीर को असल में आराम कब मिलेगा, यह सोचकर ही थकान और बढ़ जाती है। आज बस यही मन में भारी लग रहा था, इसलिए लिख दिया।
