कल रात तक काम का ढेर लगा था, आज सुबह से बिलकुल खाली बैठी हूं।
फ्रीलांसिंग में यही होता है, कभी सांस लेने की फुर्सत नहीं, कभी हाथ पर कुछ नहीं।
सुबह रोटी गूंथने बैठी तो हाथ में वो ताकत ही नहीं लगी जो पहले लगती थी।
थोड़ी देर आराम करने बैठी, पर उठने का मन ही नहीं हुआ।
हिसाब की कॉपी भी फिर से निकाली है, पर लिखते-लिखते हाथ थक जाता है।
शरीर स्थिर है, यह भी पता है, फिर भी कुछ शुरू करने की हिम्मत नहीं जुट रही।
बस आज मन बहुत भारी सा लग रहा है।
