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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

शादियों के मौसम में फिर वही बेचैनी

रात के 2 बजे तक आंख नहीं लगी। दिल बिना किसी वजह के तेज़ धड़कता रहा, सांस भी अटकती रही। यही फीलिंग 2 महीने पहले भी आई थी, और तब लगा था अब सब ठीक हो गया है।

रिटायरमेंट के बाद बहुत सुकून सोचा था। घर पर ब्रेड बनाना शुरू किया, ओवन से निकलती खुशबू में कुछ अच्छा लगता था कुछ दिन तक। पर अभी सामने 4 शादियां लाइन में हैं, हर हफ़्ते कोई न कोई फंक्शन। तैयारी का सोच के ही चेस्ट टाइट हो जाता है। कौन क्या पूछेगा, कैसे मुस्कुरा के बैठूंगी, यही घूमता रहता है दिमाग में लगातार।

लगा था ये सब पीछे छूट गया है। थेरेपिस्ट से भी महीनों से बात नहीं हुई, ज़रूरत ही नहीं लगी थी। अब समझ नहीं आता 2 बारा ये सब क्यों लौट आया। घरवालों को टेंशन नहीं देना चाहती, किसी से कहने का मन भी नहीं करता। बस आज रात नींद नहीं आई तो यहां लिख दिया।

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