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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

सैर भी अधूरी, किताब भी अधूरी

सुबह 6 बजे उठकर सैर पर जाती हूं। बस 10-15 मिनट ही हो पाता है, ज्यादा देर घुटने साथ नहीं देते। रात में मोबाइल गेम खेलते-खेलते फिर देर हो जाती है। कल भी 1 बजे तक आंखें खुली रहीं। सुबह उठना फिर मुश्किल हो जाता है।

किताब का पन्ना भी नहीं पलटा इस हफ्ते। हर रात सोचती हूं आज 10 पन्ने पढ़ूंगी, पर हाथ में मोबाइल ही रहता है।

नौकरी बदलने की बात भी दिमाग में घूमती रहती है। बायोडाटा तक नहीं बना अभी तक। कहां से शुरू करूं, समझ नही आता।

सब कुछ शुरू किया, कुछ भी पूरा नहीं हो रहा। थोड़ा थका हुआ महसूस होता है आजकल।

कमेंट 2

  • गुनगुन10.01

    रात को मोबाइल में समय कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता, मेरे साथ भी अक्सर ऐसा होता है जी। किताब पढ़ने का सोचकर भी हाथ में फोन ही रह जाता है, सुबह उठना फिर मुश्किल हो जाता है।

  • मुस्कान10.08

    मोबाइल 10, किताब 0 जी

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