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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

रिज्यूमे खोला, फिर मोबाइल में उलझ गया

रात को रिज्यूमे अपडेट करने बैठा था, पर कुछ देर में ही मोबाइल उठा लिया और गेम में लग गया। पता ही नहीं चला कब 1 बजे गया। सुबह आँख खुली तो सैर का टाइम निकल चुका था, डॉक्टर ने तो बीपी के लिए रोज चलने को खास तौर पर कहा था। बायोडाटा का पेज वैसे का वैसे खुला पड़ा रह गया, एक लाइन भी आगे नहीं बढ़ी, किताब वाला पढ़ने का हिसाब भी वहीं अटका है। इस उम्र में नौकरी बदलने की सोच ही कितनी भारी लगती है, ऊपर से यह मोबाइल वाली आदत साथ नहीं छोड़ रही। पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है, हर बार सोचता हूँ कल से ठीक करूँगा, फिर वही दोहराता हूँ। डॉक्टर की बात बार-बार याद आती है, फिर भी हाथ रुकता नहीं।

कमेंट 1

  • मुस्कान10.06

    मुझे भी ऐसा ही होता है, मोबाइल उठाते ही समय का पता नहीं चलता, सैर का समय निकल जाता है

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