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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

उम्र के इस मोड़ पर रिज्यूमे की उलझन

रात को मोबाइल में गेम खेलते-खेलते फिर देर हो गई।
पता ही नहीं चला कब आँख लग गई।
सुबह अलार्म बजा तो उठने का मन ही नहीं हुआ।
फिर भी जैसे-तैसे उठकर टहलने निकल गई, पर पैर भारी-भारी लग रहे थे।
घुटनों पर ज्यादा जोर न पड़े इसलिए धीरे-धीरे चली, फिरभी थकान नहीं गई।
लौटकर सोचा थोड़ी देर किताब पढ़ूँगी, पर आँखें बंद होने लगीं।
इस साल पढ़ने का इरादा किया था, वो भी ऐसे ही टलता जा रहा है।
नौकरी बदलने की बात भी दिमाग में घूमती रहती है।
रिज्यूमे बनाना है, इंटरव्यू की तैयारी करनी है, पर कहाँ से शुरू करूँ समझ नहीं आता।
उम्र भी अब पहले जैसी नहीं रही, ये सोचकर मन और भारी हो जाता है।
सुबह से रात तक सब कुछ अधूरा ही रह जाता है।
बस यही लगता है कि कुछ भी ठीक से नहीं हो पा रहा।

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