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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

पढ़ाई और काम के बीच दौड़ना छूट गया

आज क्लास से निकलते ही सीधे पार्ट टाइम ड्यूटी पर जाना पड़ा।
घर आकर लगा शरीर तो थक चुका है, पर दिमाग रुकने का नाम नहीं ले रहा था।

इस महीने ही दौड़ना शुरू किया था, सोचा था मन थोड़ा शांत हो जाएगा।
पर पढ़ाई और काम साथ चलें तो दौड़ने का समय निकालना ही मुश्किल हो जाता है।

एक तो पढ़ाई की थकान, दूसरा काम का प्रेशर।
दोनों साथ उठाने में कब कहाँ चूक जाऊं, यही डर लगा रहता है।

ऑफिस में सहकर्मियों के साथ कितनी नज़दीकी रखूं, कितनी दूरी, यह रोज़ की उलझन है।
काम की बात और अपनी बात के बीच की लाइन (हर दिन) धुंधली होती जा रही है।

सोने से पहले भी दिमाग अगले दिन की लिस्ट बनाता रहता है।
शरीर बिस्तर पर है, मन अभी भी कल की मीटिंग में अटका हुआ है।

आज भी वही हुआ।

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