रात 11 बजे सहकर्मी का मैसेज आया, काम की ही बात थी।
जवाब दे दिया, लेकिन उसके बाद मन शांत नहीं हुआ।
पहली बात, कल की क्लास की तैयारी अभी बाकी है।
दूसरी बात, पार्ट टाइम ड्यूटी का समय भी बदल गया है।
बिस्तर पर लेटे हुए यही सोचती रही कि (काम) और (निजी समय) के बीच की सीमा कहाँ खींचनी चाहिए।
सहकर्मियों से दूरी भी नहीं रखना चाहती, पर रात को आया मैसेज वही सीमा मिटा देता है।
देर से नींद आई।
सुबह उठना भारी लगा।
मन अभी भी हल्का नहीं हुआ है।
