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मन का समय ›आँसुओं की कहानियाँ

आज फिर बैंक ऐप खोलकर बैठ गई

आज रात 11 बजे फिर बैंक ऐप खोला।
तीसरी बार चेक किया, पर आंकड़ा वही आया।
शगुन का हिसाब अलग, फीस की किस्त अलग, पार्ट टाइम की सैलरी अलग दिन आती है।
इस बार [1200 रुपये] कम पड़ रहे हैं।
बगीचे के लिए खाद मंगवानी थी, वो टाल दी।
थोड़ी देर बस फोन की स्क्रिन देखती रही… कुछ समझ नहीं आया कि कहाँ से एडजस्ट करूं।
नोटबुक में लिखते-लिखते हाथ भी थक गया।
बस यही चल रहा है आजकल।

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